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क्या रुक पाएगी धर्म, नस्ल पर वोट बैंक की राजनीति?

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देश के सर्वोच्च न्यायालय का एक अहम फैसला आया है, जिसके अनुसार भारत में धर्म, नस्ल, जाति और भाषा को आधार मानकर वोट मांगना, भ्रष्ट आचरण माना जाएगा। निश्चित रूप से यह भारत जैसे विविधता और बहुसंस्कृति वाले देश में महत्वपूर्ण है, सुधारवादी है। लेकिन यह कितना कारगर होगा, इसके लिए और इंतजार करना होगा। हालांकि यह भी सही है कि कानून पहले भी था लेकिन उसकी व्याख्या, अपने-अपने तरीके से की जाती रही। यह सर्वविदित है कि भारत में धार्मिक और जातिगत आधारों पर वोट की अपील नहीं की जा सकती है। जाहिर सी बात है कि जब अपील नहीं की जा सकती है तो चुनावी घोषणा पत्र में, वायदों में या बातों में इसका संकेत भी बहुत दूर की बात होगी।
अब यह राजनतीक दलों के लिए कितना गले की फांस बनेगा नहीं, पता, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की संवैधानिक पीठ द्वारा 4-3 के बहुमत से दिया गया फैसला भारत में जातिगत राजनीति को रोकने और सभी के लिए समानता का भाव वाला जरूर है। फिर भी सवाल वही कि क्या यह प्रभावी होगा? राजनैतिक दल उसका अनुसरण करेंगे?
धर्म, नस्ल, जाति और भाषा के नाम पर राजनीति को रोकने वाला यह फैसला न केवल राजनैतिक दलों बल्कि प्रत्याशियों, अभिकर्ताओं और मतदाताओं को भी नियंत्रित करेगा। साफ है, सुप्रीम कोर्ट की मंशा देश में धार्मिक विद्वेष और मजहबी राजनीति पर पाबंदी लगाना ही है।  सवाल फिर वही कि क्या इससे मतदाताओं का ध्रुवीकरण रुक पाएगा? राजनीतिक दल बिल्कुल साफ-सुथरे चुनाव लड़ेंगे? जाहिर है, ऐसा बहुत ही मुश्किल लगता है। लेकिन उम्मीद की एक आस तो सुप्रीम कोर्ट ने देश में राजनीतिक शुध्दता के लिए जगा ही दी है।
इस अहम फैसले के बाद यदि सबसे ज्यादा किसी की जिम्मेदारी बढ़ी है तो वह पहले से ही जिम्मेदार, चुनाव आयोग। वैसे भी टी.एन. शेषन युग से ही चुनाव आयोग की प्रासंगिकता और सख्ती ने चुनाव प्रक्रिया को बेहद पारदर्शी और पक्षपात रहित बनाया है। लेकिन केवल चुनाव प्रक्रिया से ही सब कुछ ठीक-ठाक होने वाला नहीं। चुनाव के दौरान दलों, प्रत्याशियों, अभिकतार्ओं के भृष्टचारों, नियम विरुद्ध क्रियाकलापों और आचरण रोक पाना काफी मुश्किल हो रहा था।  यह सर्वविदित है कि भारत में किस तरह से चुनाव जीतने के लिए भाषा, धर्म, जाति, और समुदाय के नाम पर मतदाताओं को लुभाया जाता है। इतना ही नहीं धर्म गुरुओं से अपील और फतवे तक जारी कराए जाते हैं। इन हालातों के बावजूद धर्म या पंथ निरपेक्षता की बातें सिवाय कोरी बेमानी के और कुछ नहीं रह जाते।
नए साल के पहले ही कार्य दिवस पर आए अहम फैसले में 7 न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ में 4 न्यायाधीशों जिनमें मुख्य न्यायाधीश सहित टी.एस. ठाकुर, न्यायाधीश एम.बी. लोकुर, न्यायाधीश एल.एन. राव और न्यायाधीश एस.ए. बोवड़े का मानना था कि धार्मिक आधारों पर वोट मांगना संविधान के विरुद्ध है, क्योंकि मतदान एक धर्मनिरपेक्ष पद्धित है। वहीं 3 न्यायाधीशों में न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़, न्यायाधीश ए.के. गोयल और न्यायाधीश यू.यू. ललित इससे सहमत नहीं थे।
गौरतलब यह भी है कि इस फैसले के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही 1995 में एक मामले में की गई न्यायिक टिप्पणियों के भ्रम का भी निवारण कर दिया है जिसमें तब न्यायाधीश जे.एस. वर्मा की अध्यक्षता वाली पीठ ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 123 (3) की व्याख्या में कहा था कि चुनावी उद्बोधनों में हिंदू धर्म के उल्लेख का हमेशा यह मतलब नहीं निकाला जा सकता है कि वोट धर्म के आधार पर मांगा गया है।
इतना ही नहीं, टिप्पणी भी की थी कि ‘उद्बोधनों में हिंदुत्व या हिंदू धर्म की चर्चा भारतीय जनमानस की जीवन पद्धति, शिष्टाचार और सांस्कृति लोकाचार पर जोर डालने के लिए किया जाता है।’
इस प्रकरण में जस्टिस वर्मा एवं बेंच की तबकी टिप्पणियों को स्पष्ट करने की प्रार्थना की गई थी, जिसके बाद 4/3 के बहुमत से नए साल में यह फैसला आया। कोर्ट ने यह भी माना कि मानव एवं ईश्वर के बीच एक निजता का संबंध है। ऐसे में किसी भी तरह की दखलंदाजी अनुचित है, क्योंकि राजनीति का संबंध राज्य की व्यवस्था नीति से है। इसलिए धर्म को राजनीति से अलग रखा जाए।
वैसे भी भारतीय न्यायिक प्रणाली में पहले से ही यह व्यवस्था है, जिसमें धर्म, जाति, समुदाय आधारित राजनीति की मनाही है। इस फैसले ने इसी बावत कुछ भ्रांतियों का निराकरण जरूर साफ कर दिया है कि अब राजनीतिक पार्टियां खुले आम धर्म या जाति के आधार वोट नहीं मांग पाएंगी।
लेकिन सवाल फैसला आने के चंद घंटों बाद ही दूसरे ही दिन उठ खड़ा हुआ। मंगलवार को मायावती की एक प्रेस कांफ्रेन्स लखनऊ में हुई जिसमें उन्होंने उत्तर प्रदेश में सभी 403 विधानसभा सीटों पर प्रत्याशियों के लिए आरक्षित टिकटों का हिसाब दिया।
समें दलित, मुस्लिम, पिछड़ा, सवर्ण, सवर्णों में भी ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य, कायस्थ और सिखों वर्गों को दी गई टिकटों का हिसाब रखा। यह कितना गलत या सही है नहीं मालूम लेकिन इतना तो झलकता ही है कि यह चुनावी लाभ के लिए वर्ग, नस्ल और धार्मिक संतुलन बनाए रखने की घोषणा थी। बहरहाल अभी तो यह शुरुआत मात्र देखना है कि आगे-आगे होता है क्या? क्या धर्म, जाति, समुदाय के नाम पर वोट मांगना वाकई रुक पाएगा या फिर धर्म और जाति की नफरत फैलाने वाली राजनीति की ही तूती आसन्न आगामी विधानसभा चुनावों में बोलेगी या फिर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती चलेगी?

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