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बदलते मौसम में जब सताये वायरल

illness1आजकल गर्मी जाने को है, जबकि ठंड ने आने के लिए दस्तक दे दी है, सुबह व रात में हल्की ठंड होने भी लगी है, जबकि दिन में गर्मी होती है। इस बदलते मौसम में वायरल होने खतरा प्रबल हो जाता है। समय रहते सावधानी बरतने अथवा इलाज करने से ही इससे बचा जा सकता है। यह कई तरह के विषाणुओं द्वारा श्वसन मार्ग में फैले संक्रमण के कारण होता है। इसमें 101 डिग्री से 104 डिग्री तक बुखार आने के साथ-साथ छींक आना नाक बहना, बलगम, गले में खराश, भूख न लगना शरीर और सिरदर्द, थकावट और खांसी आदि लक्षण पाए जाते हैं। इसके फैलने का कारण वातावरण में मौजूद वायरस है जो एक-दूसरे में सांस के जरिये, छींकने से या खांसने पर ड्रॉप्लेट्स द्वारा फैलता है। इसे रेस्पिरिटरी इन्फेक्शन का वायरस कहते हैं, जो जाड़े में ज्यादा फैलता है।
हैजा भी वायरस से फैलता है। यह किसी भी मौसम में हो सकता है। डेंगू, मलेरिया, फ्लू, चिकनगुनिया, पीलिया, डायरिया और हेपेटाइटिस भी वायरस से फैलते हैं, जो साल में कभी भी हो सकते हैं। वायरल फैलने का प्रमुख कारण इन्फेक्शन ही होता है। इन्फेक्शन भी कई प्रकार का होता है।
अपर रेस्पिरेटरी इन्फेक्शन
हम जब छींकते हैं या खांसते हैं तो हवा में सैकड़ों ड्रॉप्लेट्स फैल जाते हैं। हम जब सांस लेते हैं तो यही वायरस हमारे शरीर में प्रवेश कर जाता है। एक से चार दिन के भीतर पूरे शरीर में यह फैल जाता है। इसे हम कॉमन कोल्ड या अपर रेस्पिरेटरी इन्फेक्शन कहते हैं।
लोअर रेस्पिरेटरी इन्फेक्शन
कॉमन कोल्ड या वायरल तो दो-तीन दिन में खुद ठीक हो जाता है, लेकिन अगर यह लंबे समय तक रहे तो तेज खांसी, बुखार, नाक से गाढ़ा बलगम, छाती में बलगम जमा होने लगता है। इससे सांस लेने में तकलीफ, बुखार, निमोनिया आदि दिक्कतें बढऩे लगती हैं। इसे लोअर रेस्पिरेटरी इन्फेक्शन कहा जाता है।
साइनोसाइटिस होने से मरीज की नाक, सिर, माथा जकडऩे लगता है और पूरा चेहरा दर्द करता है और उसे भारीपन महसूस होता है। कई बार नाक से गाढ़ा सा बलगम और साथ में खून आने लगता है। यह वायरल से बैक्टीरियल इन्फेक्शन कहलाता है। वायरल पहली स्टेज है और बैक्टीरियल इन्फेक्शन सेकंडरी, जिसमें मरीज को एंटीबैक्टीरियल दवाएं देना जरूरी हो जाता है।
वायरस फैलने की वजह
सर्दियों में सुबह-शाम वातावरण में प्रदूषण की एक परत छाई रहती है। इसी हवा में हम सांस लेते हैं जिसमें हजारों तरह के वायरस होते हैं। भीड़भाड़ वाली जगह पर इक_ा होने से भी वायरस फैलता है। आजकल मेलों, मॉल, सिनेमा हॉल में छुट्टी बिताने का चलन है। ऐसी जगहों पर एयरकंडिशनर लगे होते हैं। बाहर की ताजा हवा तो मिलती ही नहीं। जब लोग छींकते हैं, खांसते हैं तो वही ड्रॉप्लेट्स पूरी हवा में फैल जाते हैं और लोग वायरस की चपेट में आ जाते हैं।
एलोपैथी
अगर किसी को सिर्फ जुकाम हुआ है तो आमतौर पर उसे किसी खास इलाज की जरूरत नहीं होती। अगर आप दवा लेंगे तो भी इसे ठीक होने में उतना ही टाइम लगेगा और नहीं लेंगे, तो भी। ठीक होने का समय आप कम नहीं कर सकते।
दरअसल, हर बीमारी की कुछ फितरत होती है और वह ठीक होने में थोड़ा समय लेती ही है। उसके बाद वह खुद शरीर छोडक़र भागने लगती है। फिर भी अगर करना ही पड़े तो जुकाम में लक्षणों के आधार पर ट्रीटमेंट दिया जाता है। मरीज को तेज छींकें आ रही हैं तो उसे ऐसी दवा दी जाती है जिससे उसकी छींकें रुक जाएं। अगर मरीज की नाक बंद है तो नाक खोलने की दवा दी जाती है और अगर बुखार है तो पैरासीटामोल मसलन कालपोल और क्रोसीन जैसी दवाएं डॉक्टर लिखते हैं।
जुकाम में एंटीवायरल ड्रग्स नहीं दी जातीं और एंटीबायोटिक्स का तो इसके इलाज में कोई रोल ही नहीं है। कई बार शुरू में वायरल इन्फेक्शन होता है और बाद में बैक्टीरियल इन्फेक्शन हो जाता है। इसे सेकंडरी बैक्टीरियल इंफेक्शन कहा जाता है। इसमें एंटीबायोटिक्स दवाएं दी जाती हैं।
अगर किसी मरीज को साथ में बैक्टीरियल इंफेक्शन भी है तो एंटीबायोटिक दी जाएंगी, लेकिन इन्हें कम-से-कम पांच दिन दिया जाता है। कुछ वायरस के लिए एंटीवायरल ड्रग्स भी आ चुके हैं, लेकिन ज्यादातर वायरस के लिए एंटीवायरल ड्रग्स काम नहीं करते। हरपीज, चिकनपॉक्स और हेपेटाइटिस जैसी कुछ बीमारियों के लिए एंटीवायरल ड्रग्स उपलब्ध हैं।
होम्योपैथी
होम्योपैथिक परिषद्ï के सदस्य डा० अनिरूद्घ वर्मा बताते है कि वायरल बदलते मौसम में ही होता है। जिसमें टाइफाइड बुखार, पीलिया, फोड़े-फुंसी, दाद खुजली तथा अन्य चर्म रोग हो जाते हैं। वायरल इन्फेक्शन में इन होम्योपैथिक दवाओं को दिया जाता है-बेलाडोना, एलियम, सीपा, आर्सेनिक, रस टॉक्स, चाइना इपीटोसियम पर्फ, यूफेशिया आदि। तेज छीकें आने और नाक से पानी बहने पर रसटॉक्स , आर्सेनिक अलबम, एलीयिम सीपा गले में इन्फेक्शन है तो ब्रायोनिया, रस टॉक्स, जेल्सीमियम बदन दर्द और सिर दर्द है तो फेरम फॉस लोअर रेस्पिरेटरी समस्या है तो ब्रायोनिया , कोस्टिकम के साथ बायोकेमिक मेडिसिन ऊपर लिखी गई सभी दवाएं डॉक्टर मरीज की स्थिति और लक्षणों को जांचने-परखने के बाद ही लिखते हैं। बड़ों, बच्चों और महिलाओं के लिए इन दवाओं की अलग-अलग डोज और अलग-अलग पावर होती हैं। इसलिए इन दवाओं को डॉक्टर की सलाह से ही लेना चाहिए।
आयुर्वेद
आयुर्वेदाचार्य वैद्य स्वदेश अग्रवाल ने बताया कि वायरल के इलाज में आयुर्वेद मौसम के मुताबिक खानपान पर जोर देता है। यदि हम बदलते मौसम में अपने खान पान पर ध्यान रखें तो वायरल से बचा जा सकता है। वायरल में शरीर की शक्ति क्षीण हो जाती है। फिर भी अगर वायरल हो ही जाए तब आयुर्वेद का सहारा लिया जा सकता है। तुलसी की पत्तियों में कीटाणु मारने की क्षमता होती है। लिहाजा बदलते मौसम में सुबह खाली पेट दो-चार तुलसी की पत्तियां चबाएं। अदरक गले की खराश जल्दी ठीक करता है। इसे नमक के साथ ऐसे ही चूस सकते हैं। गिलोय, तुलसी की 8-9 पत्तियां, काली मिर्च के 4-5 दाने, दाल-चीनी 4-5, इतनी ही लौंग, वासा (अड़ूसा) की थोड़ी सी पत्तियां और अदरक या सोंठ मिलाकर काढ़ा बना लें। इसे तब तक उबालें, जब तक पानी आधा न रह जाए। छानकर नमक या चीनी मिलाकर गुनगुना पी लें। इसे दिन में दो-तीन बार पीने से आराम मिलता है। काढ़ा पीकर फौरन घर के बाहर न निकलें। वायरल बुखार में रात को सोते वक्त एक कप दूध में चुटकी भर हल्दी डालकर पिएं। गले में ज्यादा तकलीफ है तो संजीवनी वटी या मृत्युंजय रस की दो टेबलेट्स भी इसके साथ लेने से आराम मिलता है। गले में इन्फेक्शन है तो सितोपलादि चूर्ण फायदेमंद है। इसे तीन ग्राम शहद में मिलाकर दिन में दो बार चाटें। खांसी में आराम मिलेगा। डायबीटीज के मरीज शहद की जगह अदरक या तुलसी का रस मिलाकर लें। वैसे गर्म पानी से भी इस चूर्ण को लेने से आराम मिल जाएगा। त्रिभुवन कीर्ति रस, मृत्युंजय रस या नारदीय लक्ष्मीविलास रस में से किसी एक की की दो-दो टेबलेट्स, दिन में तीन बार गुनगुने पानी से लेने से गले को आराम मिलता है। टॉन्सिल्स व गले में दर्द है तो कांछनार गुग्गुलू वटी की दो-दो टेबलेट्स सुबह-शाम गुनगुने पानी से लें।

गले में खराश और आंखों से पानी आना:- जब नाक का रास्ता बंद होता है तो वही पानी आंखों के रास्ते बहने लगता है। कुछ बच्चों की नाक बंद होती है तो कुछ को बहुत छींक आती हैं। कुछ बच्चों को हल्का बुखार भी महसूस होता है। आप थर्मामीटर लेकर नापें तो बुखार पता भी नहीं चलता। इसे अंदरूनी बुखार या हरारत भी कहते हैं। सभी बच्चों में जुकाम के लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं।

क्या करें कि वायरल हो ही ना
वायरल दो तरह का होता है- एंडनिक और पेंडनिक। एंडनिक वायरल की वजह से होने वाला फ्लू किसी एक जगह पर दिखाई पड़ता है, जबकि पेंडनिक सब जगह देखा जा सकता है। पेंडनिक वायरस दुनिया भर में एक महीने के भीतर ही फैल सकता है। यह वायरस अपनी शक्ल-सूरत बदल लेता है और एक नए वायरस की तरह दिखना शुरू हो जाता है। यह उन सब लोगों पर अटैक करता है, जो इससे पीडि़त व्यक्ति के संपर्क में आते हैं। इससे बचाव के लिए डब्ल्यूएचओ साल में दो बार सितंबर और मार्च में एंटी-फ्लू वैक्सीन रिलीज करता है। सितंबर में उत्तरी क्षेत्र (जहां हम रहते हैं) और मार्च में दक्षिणी क्षेत्र (ऑस्ट्रेलिया) में यह वैक्सीन रिलीज होता है।
यह वैक्सीन 600 से 900 रुपये के बीच उपलब्ध है, जिसे छह महीने के बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को दिया जा सकता है। छह महीने से कम उम्र के बच्चों को यह साल में दो बार दिया जाता है, जबकि इससे ऊपर के लोगों को साल में केवल एक बार। ये वैक्सीन वैक्सीग्रिप, फ्लूरिक्स, इनफ्लूबैक जैसे नामों से उपलब्ध हैं। कोशिश यह होनी चाहिए कि सर्दी न लगे। पूरे कपड़े पहनकर बाहर जाएं। कोई खांस रहा हो तो रुमाल हाथ में रखें। खुद भी अगर खांस रहे हैं या छींक रहे हैं तो रुमाल ले लें। कभी खाली पेट घर से बाहर न निकलें। खाली पेट शरीर को कमजोर करता है। खाना मौसम के हिसाब से लें। अगर बाहर खाएं, तो सफाई का पूरा ध्यान रखें। इस मौसम में फ्रिज का पानी पीने से बचें। आइसक्रीम या ज्यादा ठंडी चीज से परहेज करें।

और हो ही जाए तो…
-नमक डालकर गुनगुने पानी के गरारे करें।
-ज्यादा से ज्यादा पानी और विटामिन सी वाली चीजें लें, लेकिन ज्यादा खट्टे फलों से बचना चाहिए।
-वायरल के दौरान सामान्य, पौष्टिक खाना यानी संतुलित आहार लें।
-अगर बुखार है और भूख नहीं लगती, तो हैवी खाना न लें क्योंकि वह बुखार के कारण पचेगा नहीं।
-जहां तक संभव हो सके, गरम व तरल पदार्थ जैसे सूप, दलिया, खिचड़ी और रसेदार सब्जियां भरपूर मात्रा में लें।
-तुलसी, अदरक, शहद और च्यवनप्राश का इस्तेमाल करते रहें।
क्या है टेस्ट
सिर्फ जुकाम होने पर कोई भी टेस्ट नहीं कराया जाता। डेंगू, मलेरिया, मेनिनजाइटिस, हेपेटाइटिस या एंकेफ्लाइटिस जैसी बीमारियों को कंफर्म करने के लिए ब्लड टेस्ट कराया जाता है। डेंगू होने की आशंका लगती है तो डॉक्टर प्लेटलेट्स काउंट टेस्ट की सलाह देते हैं।

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