प्रदेश

पूर्व की सरकारों ने इंसेफेलाइटिस से नौनिहालों की मौत रोकने का कोई प्रयास नही किया: सीएम योगी

गोरखपुर। चार दशक तक पूर्वी उत्तर के मासूमों पर कहर बरपाने वाली महामारी इंसेफेलाइटिस से भयाक्रांत जन के मन की कसक योगी सरकार ने पांच साल में ही मिटा दी। पूर्वी उत्तर प्रदेश में 1978 में पहली बार दस्तक देने वाली इस विषाणु जनित बीमारी की चपेट में 2017 तक जहां 50 हजार से अधिक बच्चे असमय काल के गाल में समा चुके थे और करीब इतने ही जीवन भर के लिए शारीरिक व मानसिक विकलांगता के शिकार हो गए, वहीं पिछले पांच सालों में ये आंकड़े दहाई से होते हुए इकाई में सिमटते गए। पूर्व की सरकारों ने नौनिहालों पर कहर बरपाने वाली इस महामारी को रोकने का कोई प्रयास नही किया, वहीं 2017 में पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने समन्वित प्रयासों के “दस्तक” से सूबे को इंसेफेलाइटिस मुक्त बनाने में पूर्ण सफलता हासिल कर ली है।

इस महामारी का केंद्र बिंदु समझे जाने वाले गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज के इंसेफलाइटिस वार्ड में एक दौर वह भी था जब हृदय को भेदती चीखों के बीच एक बेड पर दो से तीन बच्चे भर्ती नज़र आते थे, अब इस वार्ड के बेड खाली हैं। कभी किसी बेड पर मरीज आ भी गया तो दुरुस्त इलाज की व्यवस्था के सुकून में रहता है। यह सब सम्भव हुआ है इस महामारी को करीब से देखने, बतौर सांसद लोकसभा में हमेशा आवाज उठाने और मुख्यमंत्री बनने के बाद टॉप एजेंडा में शामिल कर इंसेफेलाइटिस उन्मूलन का संकल्पित व समन्वित कार्यक्रम लागू करने वाले योगी आदित्यनाथ के संवेदनशील प्रयासों से।

पूरब पर भारी गुजरते थे चार महीने

1978 में जापानी इंसेफेलाइटिस के मामले पूर्वी उत्तर प्रदेश में पहली बार सामने आए। इसके पहले 1956 में देश मे पहली बार तमिलनाडु में इसका पता चला था। चूंकि इंसेफेलाइटिस का वायरस नर्वस सिस्टम पर हमला करता है इसलिए जन सामान्य की भाषा में इसे मस्तिष्क ज्वर या दिमागी बुखार कहा जाने लगा। बीमारी तब नई-नई थी तो कई लोग ‘नवकी बीमारी’ भी कहने लगे। हालांकि देहात के इलाकों में चार दशक पुरानी बीमारी आज भी नवकी बीमारी की पहचान रखती है। 1978 से लेकर 2016 तक मध्य जून से मध्य अक्टूबर के चार महीने प्रदेश के पूरब यानी गोरखपुर और बस्ती मंडल के लोगों, खासकर गरीब ग्रामीण जनता पर बहुत भारी गुजरते थे। भय इस बात का कि न जाने कब उनके घर के चिराग को इंसेफेलाइटिस का झोंका बुझा दे। मानसून में तो खतरा और अधिक होता था, कारण बरसात का मौसम वायरस के पनपने को मुफीद होता है। 1978 से 2016 तक पूर्वी उत्तर प्रदेश में प्रतिवर्ष औसतन 1200 से 1500 बच्चे इंसेफेलाइटिस के क्रूर पंजे में आकर दम तोड़ देते थे। सरकारी तंत्र की बेपरवाही से 2016 तक कमोवेश मौत की यह सालाना इबारत लिखी जाती रही। मौत के इस खेल में सिर्फ बदलाव बीमारी के नए स्वरूप का हुआ। जापानी इंसेफेलाइटिस (जेई) के नाम से शुरू यह बीमारी अब एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) के रूप में भी नौनिहालों की जान की दुश्मन बन गई। पर, 2017 के बाद इंसेफेलाइटिस पर नियंत्रण के उपायों से दिमागी बुखार का खौफ दिल ओ दिमाग से दूर होता चला गया।

इंसेफेलाइटिस उन्मूलन रही योगी की शीर्ष प्राथमिकता

मार्च 2017 में पहली बार मुख्यमंत्री बनते ही योगी आदित्यनाथ ने इंसेफेलाइटिस के उन्मूलन को अपनी शीर्ष प्राथमिकता में रखा। 1998 में पहली बार लोकसभा में इंसेफेलाइटिस का मुद्दा गूंजा था तो इसकी पहल तब पहली बार सांसद बने योगी ने ही की थी। तब से 2017 में मुख्यमंत्री बनने से पहले बतौर सांसद, 19 वर्षों तक सदन के हर सत्र में उन्होंने इस महामारी पर आवाज़ बुलंद की।

सत्ताधीशों की तंद्रा तोड़ने को तपती दोपहरी में करते थे पैदल मार्च

पूर्वांचल के बच्चों के लिए मौत का पर्याय बनी रही इंसेफेलाइटिस पर रोकथाम के लिए तत्कालीन सत्ताधीशों की तन्द्रा तोड़ने को योगी आदित्यनाथ ने तपती दोपहरी में अनेक बार गोरखपुर के मेडिकल कॉलेज से जिलाधिकारी और कमिश्नर दफ्तर तक 10 किलोमीटर से अधिक पैदल मार्च भी किया। उनकी सजल आंखों ने मेडिकल कॉलेज में मासूमों के दम तोड़ने का खौफनाक मंजर देख रखा है, उनके दिल में उन बच्चों के बेबस माता पिता का दर्द भी पैबस्त है, उन्होंने इस बीमारी से विकलांग उन बच्चों की मनोदशा को करीब से महसूस किया है। तब, योगी से बेहतर और ठोस कार्ययोजना और कौन बना सकता था।

अंतर विभागीय समन्वयन की दस्तक

इंसेफेलाइटिस के मुद्दे पर दो दशक के अपने संघर्ष में योगी इस बीमारी के कारण, निवारण के संबंध में गहन जानकारी रखते हैं। बीमारी को जड़ से मिटाने के अपने संकल्प को लेकर उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूती के साथ स्वच्छता, शुद्ध पेयजल और जागरूकता को मजबूत हथियार माना। इसी ध्येय के साथ उन्होंने अपने पहले ही कार्यकाल में संचारी रोगों पर रोकथाम के लिए ‘दस्तक अभियान’ का सूत्रपात किया। यह अंतर विभागीय समन्वय की ऐसी पहल थी जिसने इंसेफेलाइटिस उन्मूलन की इबारत लिखने को स्याही उपलब्ध कराई। दस्तक अभियान में स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण विकास, पंचायती राज, महिला एवं बाल कल्याण आदि विभागों को जोड़ा गया। आशा बहुओं, आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों, एएनएम, ग्राम प्रधान, शिक्षक स्तर पर लोगों को इंसेफेलाइटिस से बचाव के प्रति जागरूक करने की जिम्मेदारी तय की गई। गांव-गांव शुद्ध पेयजल और हर घर में शौचालय की व्यवस्था करने का युद्ध स्तरीय कार्य हुआ। घर-घर दस्तक देकर बच्चों के टीकाकरण के लिए प्रेरित किया गया। योगी सरकार के इस अभियान को अच्छा प्लेटफॉर्म मिला 2014 से जारी मोदी सरकार के स्वच्छ भारत मिशन के रूप में। इस अभियान से खुले में शौच से मुक्ति मिली जिसने बीमारी के रोकथाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

शानदार रहे दस्तक अभियान के नतीजे

पिछले पांच सालों में दस्तक अभियान के नतीजे शानदार रहे हैं। टीकाकरण जहां शत प्रतिशत की ओर अग्रसर है तो वहीं ग्रामीण स्तर पर आशा बहुओं द्वारा फीवर ट्रेकिंग किये जाने , सरकारी जागरूकता और स्वच्छता संबंधी प्रयासों से इंसेफेलाइटिस के मामलों और इससे मृत्यु की रफ़्तार पूरी तरह काबू में आ गई है।

योगी जी ने मिटा दिया बीमारू का कलंक : डॉ शाही

इंसेफेलाइटिस कंट्रोल को लेकर योगी सरकार के प्रयासों की सराहना करते हुए इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, गोरखपुर के अध्यक्ष डॉ शिवशंकर शाही कहते हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के माथे से इंसेफेलाइटिस व बीमारू का कलंक मिटा दिया है। सीएम के रूप में इसके उन्मूलन की कार्ययोजना बनाने से पहले उन्होंने दो दशक तक इसकी लड़ाई लड़ी थी। पूर्व की सरकारों ने बीमारी से लड़ने का सारा ठीकरा स्वास्थ्य विभाग पर फोड़ रखा था। यह सीएम योगी की दूरदृष्टि रही कि उन्होंने स्वास्थ्य विभाग को नोडल बनाकर अन्य दर्जनों विभागों को जोड़ा। इसका सुखद नतीजा भी सबके सामने है।

सहज उपलब्ध होने लगा इलाज

मार्च 2017 में पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ की प्राथमिकता यह भी थी कि एक भी इंसेफेलाइटिस मरीज इलाज से वंचित न रह जाए। उनके कमान संभालने तक पूर्वी उत्तर प्रदेश में इंसेफेलाइटिस के इलाज का केंद्र बिंदु गोरखपुर का मेडिकल कॉलेज ही था। मरीजों की संख्या के मुकाबले यहां तब इंतजाम भी पर्याप्त नहीं थे। इसकी जानकारी तो उन्हें पहले से ही थी। लिहाज़ा मेडिकल कालेज में चिकित्सकीय सेवाओं को मजबूत करने के साथ उन्होंने ऐसी व्यवस्था बना दी कि मरीज को समुचित इलाज गांव के पास ही मिल जाए। इस कड़ी में सभी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी-पीएचसी) को इंसेफेलाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर के रूप में विकसित कर इलाज की सभी सुविधाएं सुनिश्चित कराई गईं। सीएचसी-पीएचसी स्तर पर विशेषज्ञ चिकित्सकों के साथ मिनी पीकू (पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट) की व्यवस्था है। सबसे बड़ी बात यह कि इंसेफेलाइटिस के इलाज और इसके समूल उन्मूलन के इंतजामों पर सीधे सीएम योगी की नजर रहती है।

बीआरडी मेडिकल कॉलेज में इन जिलों से आते थे इंसेफेलाइटिस के मरीज

गोरखपुर, देवरिया, महराजगंज, कुशीनगर, बस्ती, संतकबीरनगर, सिद्धार्थनगर के अलावा यूपी की सीमा से लगे बिहार के गोपालगंज, बगहा, सिवान तथा नेपाल की तराई के जिलों से इंसेफेलाइटिस रोगी पहले बीआरडी मेडिकल कॉलेज ही उपचार के लिए आते थे। यूपी में सरकार के प्रयासों से बीमारी नियंत्रित हुई है तो जिलों में सीएचसी और पीएचसी स्तर पर बेहतर चिकित्सकीय सुविधा मिलने से बीआरडी में आने की जरूरत नहीं के बराबर पड़ रही है।

चार दशक में हुई थीं पचास हजार से अधिक मौतें

पूर्वी उत्तर प्रदेश में करीब चार दशक (1978 से 2016) में अनुमानतः पचास हजार से अधिक बच्चे इंसेफेलाइटिस से काल कवलित हुए। आंकड़ों के लिहाज से अकेले गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज की बात करें तो 2016 में यहां 1765 इंसेफेलाइटिस मरीज भर्ती हुए जिनमें से 466 की मौत हो गई थी। योगी के सीएम बनने के बाद गोरखपुर में एईएस के 817 और जेई के 52 मरीज मिले। मरीजों की संख्या कम होने के साथ ही मौतों की संख्या में भी कमी आई। गोरखपुर में 2017 में मौतों (जेई व एईएस दोनों) का ग्राफ घटकर 124 पर आ गया। दस्तक अभियान, सुदृढ़ चिकित्सा सुविधाओं से इसमें लगातार गिरावट आती गई है। 2020 में जेई व एईएस मिलाकर 240 मरीज भर्ती हुए। मौतों का आंकड़ा भी गिरकर 15 पर सिमट गया। 2021 में गोरखपुर में एईएस के सिर्फ 219 मरीज आए जिनमे से 15 ने दम तोड़ दिया जबकि जेई से कोई मौत नहीं हुई है।

Show More

Related Articles

Back to top button
Close
Close